Wednesday, April 14, 2021

वक़्त का इशारा

वक़्त हमें अपने इशारों से समझाता है, इतनी बारीकी से कि कई बार समझना कितना मुश्किल है। आज पापा से चर्चा हुई, ऐसे तो चर्चाओं का वक़्त नहीं लेकिन कभी इत्तिफाक होते हैं। 
"आप क्या कर रहे हैं," मैंने पूछा था।
"कुछ खास नहीं अपनी अबतक की रचनाएँ समेट रहा हूँ, कुछ नया लिखने का वक़्त नहीं। पुराना समेट लूँ," पापा ने कहा।
"मैं अपने बेतरतीब पड़े पन्नों, फाइलों को समेटना चाहती हूँ, लेकिन नया कितना कुछ लिखना है, मुझे भी वक़्त नहीं मिलता," मैंने कहा था।
"हमारे लेखेजोखे हमेशा से बिखरे होते हैं, यहाँ-वहाँ हर जगह।"
🍂🍃
        --------------®️रश्मि पाठक
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Time explains to us with its own gestures, so closely that it is difficult to understand at times. Discussed with father today, there is no time for such discussions but sometimes there are coincidences.
 "What are you doing," I asked.
 "Nothing special, I am covering my compositions so far, no time to write anything new. Take the old one," Papa said.
 "I want to wrap up my random pages, files, but I don't get the time to write anything new," I said.
 "Our accounts are always scattered, here and there everywhere."
 🍃🌿
         -------------- ®Rashmi Pathak

चित्र: साभार सोशल मीडिया

2 comments:

  1. वाह, अतिसुंदर, जिन्दगी के लेखा जोखा के पन्नों को भी संजोग कर रखने की सीख .... वक़्त की कमी है

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